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shiv gyan aur vidhi शिव ज्ञान और विधी

shiv gyan aur vidhi

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जब तक इस संसार में कोई भी जिव व्यतीत है, समजलो के में व्यतीत हु. जब तक संसार में अन्याय है. यह समजलो में प्रति पल पीड़ित हूँ. संसार की शांति में ही मेरे मन की शांति है. पंचमहाभूतो का महा वग है जननी. जल द्वारा मेरे अभिषेक से जीवन दी जलकी अपमन्ना नहीं होती है. क्या यह जल का सर्वतोम उपयोग है. क्या श्रद्धा और विश्वास को प्रगट कर ने के लिए जल का अर्पण परियाप्त है. क्या निर्जल पूजा करने से में मन की भावनाओ को महत्व नहीं दूंगा? जल आत्मा की संजीवनी है.

असंख्य मनुष्य एवेम जिव जंतु जल के आभाव में जीवित रहने के विवश है. न जाने कितने व्यक्ति जल की एक बूंद के लिए तरसते रेह्स्ते है. इसमे जब नदी के भाति मुज पर जल अर्पित किया जय मुझे पीड़ा होती है. जल शारीर का संचालक है. यदि मेरे भक्त इसे जीवन सुरक्षा हेतु इसे अर्पित करेंगे में तब भी मदद हो उठूँगा. बिलिपत्र मुझे अति प्रिय है. ये मेरे संकप हरते है. धतूरा मुझे प्रिय है ये मुझे शांति देता है. किन्तु यदि संसार शांति का अभिषेक करवाना रहे. में यह सज्जनों के बिज महा युद्ध छेड़ता रहेगा. तो मात्र धतुरा और बेलपत्र अर्पित करके मेरे मन को शांति कैसे मिल जाएगी. मेरे पूजा सम्प्पन कैसे हो जाएगी. उपासना में यदि मेरे जैसे हो जाने का भाव है. तो मेरी सच्ची उपासना है. यदि उपासना का भाव मेरे दुःख और मेरे समीप आने की कामना है, तो सच्ची पूजा और भावना है. तो मन में स्मरण करो. में सुनता हूँ. तो मन में पुकारो में आता हूँ. मुझे कुछ नहीं चाहिए. यदि तुम मन को शिवमय बनाते हो तो वोही मेरे शांति से परिपूर्ण कैलाश है. वही मेरी सुन्दर काशी है. वही मेरी उज्जैनी है. कोण सी विधि, कैसी विधि? अपने आपसे पुचो की पूजा का अर्थ क्या है. पूजा तो केवल माध्यम है मुज तक पोहोचने का. मुझसे जुड़ने का. मुझसे एक होने का. किन्तु जो मुझे ही विभाजित करदे वोह मुझसे एक कैसे हो सकता है.? कैसे जुड़ सकता है मुझसे. जो अपनी भक्ति के मार्ग को औरो के मार्ग से श्रेष्ठ समजे. उसकी पूजा में सदेव अहंकार वृध्धिमान होता है.

पूजा करने के लिए श्रेष्ठता करे, समानता का भाव अषेप है. समानता केवल उन्मेही आ सकती है. जिनका मन अपने आराध्य के प्रति समर्पित हो. क्या पूजा साधनों पर आश्रित है? सामग्री पर आश्रित है? विधि आर आश्रित है? क्या भक्त के भाव, उनके विचारो पर, यदि पूजा करते समय व्यक्ति को यह स्मरण रहे, के वोह कितनी श्रद्धा, कितने समर्थक, और कितने भव्यता से पूजा कर रहा है. तो वोह पूजा नहीं. जिस व्यक्ति के मन में यह विचार हो, की उसके पास पूजा के पर्याप्त साधन नहीं. तो पूजा उसकी भी सच्ची होती. पूजा तो केवल वही सच्ची होती है, जब भक्त के मन में आराध्य के अतरिक कोई विचार न हो. कोई संकोच न हो. भक्त को यह अनुभूति हो के वोह आराध्य से पृथक नहीं है. उसके आराध्य उससे पृथक नहीं. और जो भक्त ऐसा सोचेगा, वह भक्ति के अन्य मार्गो का भी सम्मान करेगा. स्वयं मुझे पाने के लिए किसी और व्यक्ति को माध्यम बनाने की आवश्यकता नहीं. क्योंकि भक्त मुझे अपने मन की पवित्रता से प्राप्त कर सकता है. यदि भक्त का मन ही निश्चल नहीं तो किसी और के माध्यम हो जाने से वह कैसे संभव हो जायेगा. और यदि मन पवित्र है. तो फिर माध्यम की आवश्यकता ही क्यों? मेरी प्रार्थना करने के लिए प्रेम से परिपूर्ण ह्रदय चाहिए. ऐसा ह्रदय जो जीवन के प्रयेक शन. प्रेमपूर्व रहे. और यह तभी संभव है जब, व्यक्ति सबसे पहले अपने आपसे प्रेम करना सीखे. अपने आपसे जुड़ना सीखे. जब तक व्यक्ति को अपने मन में वृध्धिमान की पहेचान नहीं होती. वह दुसरो में भी उस दिव्यता को नहीं देख सकता.

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